आसमान छूता सोना चांदी के रेट

भारत में स्वर्ण और चांदी की कीमतों में बढ़ोतरी थमने का नाम नहीं ले रही है। दो साल पहले जनवरी में ही स्वर्ण की कीमत 64 हजार रुपये तोला थी आज यह एक लाख चालीस हजार रुपये के पार चढ़ती चली जा रही है। चांदी की कीमत भी दो साल के समय में 77 हजार रुपये से दो लाख नब्बे हजार रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। वैसे तो सोने और चांदी के भाव का बढ़ना कोई अचंभा नहीं है पर जितनी तेजी से दाम बढ़ रहे हैं उससे चिंता वाजिब है। पहली नजर में सोना और चांदी को निवेश के लिए स्वर्ग माना जाता है। पिछले सप्ताह भारत में सोने की कीमत में तेजी से वृद्धि हुई और यह रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई। सिर्फ पांच दिन में 24 कैरेट सोने की कीमत लगभग 51,500 रुपये प्रति 100 ग्राम बढ़ गई है। मकर संक्रांति के अवसर पर आभूषणों की मांग ने भारत में सोने की कीमतों को सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है। वैश्विक स्तर पर अगर देखें तो डॉलर की मजबूती और जगह-जगह युद्ध के हालात से भी सोने की मांग को मजबूती मिल रही है। चांदी की कीमत बढ़ने के पीछे के कारण कुछ अलग भी हैं। यह सर्वविदित है कि उसका औद्योगिक इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। उसकी मांग ज्यादा है और आपूर्ति कम अतः उसकी कीमतों में इन दिनों हम ज्यादा तेज बढ़ोतरी देख रहे हैं। चांदी की कीमत तीन लाख रुपये प्रति किलोग्राम के करीब पहुंच रही है। चांदी को पहले आम लोगों के लिए उपयोगी धातु के रूप में माना जाता था लेकिन उसकी कीमतों का बढ़ना पूरे समाज के लिए चिंता की बात है। कोई संदेह नहीं है कि चांदी की कीमतों को महंगाई से जोड़कर देखा जाएगा। व्रतों-उत्सवों पर चांदी के जेवरों का आदान-प्रदान सबसे सहज ढंग से होता है लेकिन अगर चांदी की कीमतों में यही तेजी बनी रही तो इससे ज्यादातर लोगों की सामाजिकता भी प्रभावित होगी। शादी व अन्य संस्कारों का खर्च बहुत बढ़ जाएगा। पचास ग्राम वजन की एक जोड़ी पायल भी अब 15 हजार रुपये से कम में नहीं मिलेगी। क्या सरकार इस मोर्चे पर कुछ कर सकती है? क्या आज के दौर में धातु के भाव को नियंत्रित किया जा सकता है? अगर भाव को नियम बनाकर तय करने की कोशिश नहीं होगी तो सोने-चांदी की जमाखोरी और कालाबाजारी को बढ़ने से कैसे रोका जाएगा? एक उदारीकृत अर्थव्यवस्था में फिलहाल यही कहा जा सकता है कि सोने और चांदी को बाजार भरोसे ही छोड़ दिया जाए। तब सवाल उठता है कि क्या कोई बता सकता है इनकी कीमतें कहां तक पहुंचेंगी? अगर कीमतें ज्यादा बढ़ेंगी तो सर्राफा कारोबारियों को सुरक्षा बढ़ानी पड़ेगी। जिस देश में एक आम आदमी की औसतन मासिक कमाई तीस हजार रुपये के आसपास हो वहां धातुओं की कीमतों का लाखों में होना असुरक्षा को बढ़ाएगा। स्वर्ण के वायदा कारोबार में भी जैसी तेजी दिख रही है उससे लगता है कि कीमतें अभी और ऊपर जाएंगी। ऐसे में उपाय क्या है? शेयर बाजार और औद्योगिक निवेश पर लोगों के विश्वास को बढ़ाने के प्रयास करने पड़ेंगे। चांदी के औद्योगिक इस्तेमाल का कोई बेहतर विकल्प खोजना पड़ेगा। लोग अभी अपना सोना बेचना नहीं चाहेंगे तो इससे भी कीमतों को बल मिलेगा। बैंकों के पास जो सोना है क्या उसे वे बाजार में उतार सकते हैं? दरअसल सोने का भाव जब बढ़ता है तब बैंक भी अपना फायदा देखते हैं। निस्संदेह स्वर्ण में निवेश से जो फायदा हो रहा है उससे ज्यादा फायदा अगर किसी अन्य क्षेत्र में निवेश से होने लगे तो स्थितियां सुधर सकती हैं लेकिन क्या निकट भविष्य में ऐसा ही होगा?